Module 5   ट्रेडिंग के लिए ऑप्शन थ्योरीChapter 4

कॉल ऑप्शन को राइट करना/ बेचना

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4.1 – एक सिक्के के दो पहलू

ऑप्शन के खरीदार और ऑप्शन के राइटर (बेचने वाले/ बिकवाल) दोनों, एक ही सिक्के के दो पहलू होते हैं। बस बाजार को लेकर दोनों की राय और दोनों की उम्मीदें अलग-अलग होती हैं। यहां पर आपको एक बात याद रखनी चाहिएऑप्शन बेचने वाले का P&L जैसा होता है ऑप्शन खरीदने वाले का P&L एकदम उससे उल्टा होता है। उदाहरण के तौर पर अगर ऑप्शन को बेचने वाला ₹70 का मुनाफा कमा रहा है तो इसका मतलब है कि ऑप्शन खरीदने वाला ₹70 का नुकसान सह रहा है। इसी तरह की, ऑप्शन की कुछ और समान बातें भी हैं।

  1. अगर ऑप्शन खरीदने वाले का रिस्क सीमित है (जितना उसने प्रीमियम दिया है) तो ऑप्शन बेचने वाले का मुनाफा भी सीमित है (उतना ही जितना उसको प्रीमियम मिला है) 
  2. अगर ऑप्शन खरीदने वाले का मुनाफा असीमित है तो ऑप्शन बेचने वाले के लिए रिस्क असीमित होता है।
  3. ब्रेक इवन प्वाइंट वह कीमत है जहां से ऑप्शन खरीदने वाला पैसे बनाना शुरू करता है। ठीक इसी जगह से ऑप्शन बेचने वाला पैसे गंवाना शुरू करता है।
  4. अगर ऑप्शन खरीदने वाला ₹ X  का मुनाफा कमा रहा है तो इसका मतलब है कि ऑप्शन बेचने वाला ₹ X का नुकसान उठा रहा है। 
  5. अगर ऑप्शन बेचने वाला ₹ X  का नुकसान उठा रहा है तो इसका मतलब है कि ऑप्शन खरीदने वाला ₹ X का फायदा बना रहा है।
  6. अगर ऑप्शन खरीदने वाले की राय यह है कि बाजार में कीमत ऊपर जाएगी तो ऑप्शन बेचने वाले की राय उल्टी होगी और उसे  लग रहा होगा कि बाजार में कीमत नीचे जाएगी।

इन बातों को और अच्छे से समझने के लिए कॉल ऑप्शन को, बेचने वाले के नजरिए से देखना जरूरी है और इसीलिए इस अध्याय में हम इस पर ही ध्यान देंगे।

लेकिन इस अध्याय में आगे बढ़ने से पहले मैं आपको एक बात जरूरी बात बताना चाहता हूं, ऑप्शन बेचने वाले और ऑप्शन खरीदने वाले के P&L में काफी ज्यादा समानता होती है, इसलिए इस अध्याय में कई बार आपको ऐसा लगेगा कि हम वही बातें बता रहे हैं जो पिछले अध्याय में बताई जा चुकी हैं। संभव है कि ऐसे में आपको यह लगे कि हम बातें दोहरा रहे हैं और आप अगले अध्याय की ओर बढ़ जाएं। मेरी आपको सलाह है कि आप ऐसा ना करें। बेचने वाले और खरीदने वाले के P&L के छोटे से छोटे अंतर और उसकी वजह से पड़ने वाले असर को ध्यान से देखें।

4.2 कॉल ऑप्शन को बेचने वाला और उसकी सोच

एक बार फिर से अजय और वेणु के उस उदाहरण को याद कीजिए जिस पर हमने पहले अध्याय में चर्चा की थी। हमने देखा था कि वहां 3 संभावित स्थितियां हैं जो इस समझौते में हो सकती हैं।

  1. जमीन की कीमत ₹500000 से ऊपर जा सकती है (अजय यानी ऑप्शन के खरीदार के लिए बेहतर स्थिति)  
  2. कीमत ₹500000 पर स्थिर रह सकती है ( ऑप्शन को बेचने वाले यानी वेणु के लिए बेहतर स्थिति) 
  3. जमीन की कीमत ₹500000 से नीचे जा सकती है (वेणु यानी ऑप्शन के बेचने वाले के लिए बेहतर स्थिति)

आप देख सकते हैं कि संभावनाओं का प्रतिशत ऑप्शन के खरीदार के पक्ष में नहीं है। तीन संभावना में से सिर्फ एक संभावना उसके पक्ष में है। इसका मतलब यह है कि 3 में से 2 संभावनाएं ऑप्शन बेचने वालों को फायदा पहुंचाने वाली हैं। यही वजह लोगों को ऑप्शन को बेचने को प्रोत्साहित करती है। संभावनाओं के आंकड़े के पक्ष में होने के अलावा अगर ऑप्शन बेचने वाले को बाजार की अच्छी समझ है तो उसके मुनाफा कमाने की उम्मीद काफी ज्यादा बढ़ जाती है।

याद रखिए कि मैं यहां पर सिर्फ आंकड़ों के तौर पर संभावनाओं की बात कर रहा हूं। मैं यह नहीं कह रहा कि आप्शन बेचने वाला हमेशा पैसा कमाएगा। 

एक बार फिर से बजाज ऑटो वाले उदाहरण पर नजर डालते हैं जिस पर हमने पिछले अध्याय में चर्चा की थी। इस बार इसको ऑप्शन बेचने वाले के नजरिए से देखते हैं और यह समझने की कोशिश करते हैं कि वह उसके लिए कैसी स्थिति  बन रही है। एक बार फिर से उसी चार्ट पर नजर डालते हैं

 

  • स्टॉक बुरी तरीके से पिटा हुआ है। इसका मतलब है कि इस स्टॉक को लेकर लोगों में मंदी का माहौल है। 
  • स्टॉक के इतना पिटा हुआ होने की वजह से कई लोग स्टॉक में लॉन्ग पोजीशन बनाकर फंसे हुए होंगे।
  • ऐसे में स्टॉक की कीमत में आने वाली कोई भी तेजी को लोग इस स्टॉक से निकलने के मौके के तौर पर देखेंगे।
  • इस वजह से स्टॉक की कीमत में तेज बढ़ोतरी की गुंजाइश कम ही है।
  • अगर बाजार में स्टॉक की कीमत बढ़ने की गुंजाइश कम है तो बजाज ऑटो के शेयर के कॉल ऑप्शन को बेचना और प्रीमियम ले लेना एक अच्छा मौका हो सकता है।

तो, इसी सोच के साथ ऑप्शन का बिकवाल ऑप्शन बेचता है। यहां सबसे महत्वपूर्ण बात ये है कि उसको भरोसा है कि बजाज ऑटो की कीमत अभी नहीं बढ़ेगी और इसीलिए ऑप्शन बेचना और प्रीमियम ले लेना एक अच्छी रणनीति है।

जैसा कि मैंने पिछले अध्याय में भी कहा था कि सही स्ट्राइक कीमत को पहचान पाना ही ऑप्शन की ट्रेडिंग का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा होता है। हम इस मॉड्यूल में जब आगे बढ़ेंगे तो इस पर विस्तार से चर्चा करेंगे। अभी बस यह सब मान लीजिए कि ऑप्शन को बेचने वाले ने बजाज ऑटो का ऑप्शन 2050 के स्ट्राइक कीमत पर बेचने का फैसला किया है और इसके लिए उसने ₹6.35 का प्रीमियम लिया है. एक बार फिर से नीचे दिए ऑप्शन चेन को देखते हैं– 

पिछले अध्याय की तरह एक बार फिर हम ऑप्शन बेचने वाले का P&L समझने की कोशिश करते हैं और इसके जरिए से कुछ सामान्य बिंदु/साधारणीकरण/सामान्यीकरण (Generalization) निकालते हैं जो कि कॉल ऑप्शन बेचने के बारे में कुछ बता सके। ऑप्शन के इंट्रिंसिक मूल्य के बारे में जो हमने पिछले अध्याय में पढ़ा था वो यहां भी वैसे ही लागू होगा।

Serial No.

Possible values of spot Premium Received Intrinsic Value (IV) P&L (Premium – IV)

01

1990 + 6.35 1990 – 2050 = 0 = 6.35 – 0 = + 6.35

02

2000 + 6.35 2000 – 2050 = 0 = 6.35 – 0 = + 6.35

03

2010 + 6.35 2010 – 2050 = 0

= 6.35 – 0 = + 6.35

04

2020 + 6.35 2020 – 2050 = 0 = 6.35 – 0 = + 6.35
05 2030 + 6.35 2030 – 2050 = 0

= 6.35 – 0 = + 6.35

06

2040 + 6.35 2040 – 2050 = 0 = 6.35 – 0 = + 6.35
07 2050 + 6.35 2050 – 2050 = 0

= 6.35 – 0 = + 6.35

08

2060 + 6.35 2060 – 2050 = 10 = 6.35 – 10 = – 3.65
09 2070 + 6.35 2070 – 2050 = 20

= 6.35 – 20 = – 13.65

10 2080 + 6.35 2080 – 2050 = 30

= 6.35 – 30 = – 23.65

11 2090 + 6.35 2090 – 2050 = 40

= 6.35 – 40 = – 33.65

12 2100 + 6.35 2100 – 2050 = 50

= 6.35 – 50 = – 43.65

 

हम इस चार्ट के बारे में चर्चा करें, इसके पहले कुछ बातों को ध्यान दीजिए 

  1. प्रीमियम वाले कॉलम में जो जोड़/प्लस (+) का चिन्ह लगाया गया है वह यह बताता है कि ऑप्शन बेचने वाले (ऑप्शन राइटर) के अकाउंट में पैसा आ रहा है। 
  2. ऑप्शन की इंट्रिन्सिक वैल्यू (एक्सपायरी पर) एक ही रहती है वह चाहे कॉल ऑप्शन का बेचने वाले के लिए हो या कॉल ऑप्शन का खरीदार के लिए।
  3. कॉल ऑप्शन के राइटर के लिए नेट P&L की गणना कुछ अलग तरीके से की जाती है। इस बदलाव की वजह यह है कि-
  1. ऑप्शन को बेचने वाला जो ऑप्शन बेचता है तो उसको एक प्रीमियम मिलता है (जैसे 6.35 रूपए का प्रीमियम) ऑप्शन बेचने वाले को नुकसान तब होता है जब वह अपना पूरा प्रीमियम गंवा दे। मतलब अगर उसे ₹6.35 का प्रीमियम मिला है और उसने ₹5 का नुकसान उठाया है तो इसका मतलब है कि वह अभी भी ₹1.35 के फायदे पर बैठा है यानी ऑप्शन बेचने वाले का नुकसान तब शुरू होता है जब वह अपनी प्रीमियम की पूरी रकम गंवा दे। प्रीमियम गंवाने के बाद होने वाला नुकसान ही उसका वास्तविक नुकसान होता है। इसलिए उसके P&L की गणना में होगी प्रीमियम इंट्रिसिक वैल्यू
  1. इसी बात को ऑप्शन के खरीदार पर भी लागू कर सकते हैं। क्योंकि ऑप्शन का खरीदार प्रीमियम देता है इसलिए उसे पहले अपना प्रीमियम वापस कमाना होगा तभी उसका फायदा शुरू होगा। प्रीमियम की रकम वापस पाने के बाद उसको जो भी कमाई होती है वह उसका वास्तविक मुनाफा होता है। 

ऊपर का टेबल आपको जानापहचाना लगेगा। इस टेबल के आधार पर अब हम कुछ सामान्य बातें निकाल सकते हैं (याद रखिए कि स्ट्राइक प्राइस 2050 है)

  1. बजाज ऑटो का स्टॉक जब तक 2050 के स्ट्राइक प्राइस के नीचे रहेगा तब तक ऑप्शन बेचने वाले का पैसा बनेगा। मतलब उसे ₹6.35 का पूरा पेमेंट अपने पास रखने का मौका मिलेगा। ध्यान रखिए कि उसका मुनाफा ₹6.35 पैसे पर ही स्थिर रहेगा इससे ज्यादा नहीं।

 सामान्यीकरण 1 कॉल ऑप्शन के राइटर को अधिकतम मुनाफा उतना ही होगा जितना कि उसे प्रीमियम मिला है। हां, इस मुनाफे को कमाने के लिए स्पॉट की कीमत को स्ट्राइक प्राइस के नीचे रहना जरूरी है। 

  1. अगर बजाज ऑटो की कीमत स्ट्राइक प्राइस के ऊपर जाने लगे तो ऑप्शन राइटर का नुकसान कई गुना बढ़ सकता है 

सामान्यीकरण 2 कॉल ऑप्शन के राइटर को तब नुकसान होने लगता है जब स्पॉट की कीमत स्ट्राइक प्राइस के ऊपर जाने लगती हैं। स्पॉट की कीमत स्ट्राइक प्राइस से जितना ऊपर जाएगी कॉल राइटर का नुकसान उतना ज्यादा होगा । 

  1. ऊपर के दोनों सामान्यीकरण से यह साफ है कि ऑप्शन बेचने वाले का मुनाफा तो सीमित है लेकिन नुकसान असीमित हो सकता है।

अब इनके आधार पर हम कॉल ऑप्शन को बेचने वाले का P&L बनाने की कोशिश करते हैं

P&L = प्रीमियम – Max [0, (स्पॉट कीमत स्ट्राइक कीमत)]

P&L = Premium – Max [0, (Spot Price – Strike Price)]

इस फार्मूले के आधार पर एक्सपायरी पर कुछ स्पॉट कीमतों का P&L निकालते हैं

    1. 2023
    2. 2072
    3. 2055

गणना इस तरह से होगी

@2023

= 6.35 – Max [0, (2023 – 2050)]

= 6.35 – Max [0, -27]

= 6.35 – 0

6.35

 

ये आंकड़ा सामानयीकरण के अनुसार सही है। (मुनाफा प्रीमियम तक सीमित है)

 

.

@2072

= 6.35 – Max [0, (2072 – 2050)]

= 6.35 – 22

-15.65

यहां भी उत्तर सामान्यीकरण 2 के अनुसार ही है। (जब स्पॉट कीमत स्ट्राइक कीमत के ऊपर चली जाएगी तो कॉल ऑप्शन राइटर को घाटा होगा)

@2055

= 6.35 – Max [0, (2055 – 2050)]

= 6.35 – Max [0, +5]

= 6.35 – 5

1.35

हालांकि स्पॉट कीमत स्ट्राइक से ऊपर है लेकिन कॉल राइटर फिर भी कुछ मुनाफे में दिख रहा है। ये सामान्यीकरण 2 के विपरीत है। आपको अब तक ये पता चल ही चुका है कि ये ब्रेक इवन प्वांइट के सिद्धांत की वजह से है, इसको हमने पिछले अध्याय में समझा था। 

अब इसे थोड़ा करीब से देखते हैं और यह जानने की कोशिश करते हैं कि स्ट्राइक प्राइस के पास ऐसी कौन सी कीमत है जहां पर कॉल ऑप्शन का राइटर नुकसान उठाना शुरू करता है।

 

क्रम सं.

स्पॉट की संभावित कीमत प्राप्त प्रीमियम इंट्रिन्सिक वैल्यू (IV) P&L (प्रीमियम – IV)

01

2050 + 6.35 2050 – 2050 = 0 = 6.35 – 0 = 6.35
02 2051 + 6.35 2051 – 2050 = 1

= 6.35 – 1 = 5.35

03

2052 + 6.35 2052 – 2050 = 2 = 6.35 – 2 = 4.35
04 2053 + 6.35 2053 – 2050 = 3

= 6.35 – 3 = 3.35

05

2054 + 6.35 2054 – 2050 = 4 = 6.35 – 4 = 2.35
06 2055 + 6.35 2055 – 2050 = 5

= 6.35 – 5 = 1.35

07

2056 + 6.35 2056 – 2050 = 6 = 6.35 – 6 = 0.35
08 2057 + 6.35 2057 – 2050 = 7

= 6.35 – 7 = – 0.65

09

2058 + 6.35 2058 – 2050 = 8

= 6.35 – 8 = – 1.65

10 2059 + 6.35 2059 – 2050 = 9

= 6.35 – 9 = – 2.65

 

साफ है कि स्पॉट कीमत के स्ट्राइक से ऊपर जाने के बाद भी ऑप्शन राइटर तब तक मुनाफे में रहता है जब तक स्पॉट कीमत, स्ट्राइक + प्रीमियम से अधिक नहीं होता। इस कीमत को ब्रेकडाउन प्वाइंट –Break down point कहते हैं और इसके बाद ऑप्शन बेचने वाले को नुकसान होने लगता है।

कॉल ऑप्शन बेचने वाले के लिए ब्रेक डाउन प्वाइंट = स्ट्राइक कीमत + प्राप्त प्रीमियम

बजाज ऑटो वाले उदाहरण में 

= 2050 +6.35

=2056.35

तो कॉल ऑप्शन के खरीदार का ब्रेक इवन प्वाइंट ही कॉल ऑप्शन बेचने वाले ब्रेक डाउन प्वाइंट बन जाता है।

4.3 कॉल ऑप्शन बेचने वाले का पेऑफ (Call Option Seller’s Pay-Off)

जैसा कि इस अध्याय में हमने बारबार देखा है कि कॉल ऑप्शन के राइटर और कॉल ऑप्शन के खरीदार के बीच में काफी ज्यादा समरूपता होती है। अगर हम ऑप्शन बेचने वाले के P&L ग्राफ को देखें तो हमें यह बहुत साफसाफ दिखाई पड़ता है– 

आप देख सकते हैं कि कॉल ऑप्शन के बेचने वाले का P&L पेऑफ कॉल ऑप्शन के खरीदार के P&L पेऑफ के प्रतिबिंब जैसा दिखता है। इस ग्राफ से जो बातें निकलती हैं वो वैसी ही हैं जैसी हमने अब तक इस अध्याय में चर्चा की हैं। 

  1. जब तक कीमत स्ट्राइक प्राइस यानी 2050 के नीचे रहती है तब तक मुनाफा 6.35 ही रहता है।
  2. जब कीमत 2050 से 2056.35 (ब्रेक डॉउन प्वाइंट) के बीच में रहती है तो मुनाफा धीमे-धीमे कम होता रहता है। 
  3. 2056.35 पर पहुंचने पर ना मुनाफा होता है ना नुकसान रहता है।
  4. कीमत 2056.35 के बाद कॉल ऑप्शन बेचने वाले को नुकसान होने लगता है। जैसा कि आप ग्राफ में देख सकते हैं कि जैसे-जैसे कीमत ऊपर जाती है वैसे वैसे नुकसान तेजी के साथ बढ़ता जाता है।

4.4 – मार्जिन से जुड़ी कुछ बातें

अब एक बार ऑप्शन बेचने और ऑप्शन खरीदने से जुड़े रिस्क को करीब से देखते हैं। ऑप्शन खरीदने वाले का कोई रिस्क नहीं होता, उसे सिर्फ बेचने वाले को एक प्रीमियम देना होता है। इस प्रीमियम के बदले उसे अंडरलाइंग को बाद के किसी दिन किसी एक तय कीमत पर खरीदने का अधिकार मिलता है। इस तरह से, उसका रिस्क सिर्फ इतना है जितना कि उसने प्रीमियम अदा किया है। 

लेकिन जब हम ऑप्शन बेचने वाले के रिस्क को देखते हैं तो हमें पता चलता है कि उसका रिस्क असीमित है। अगर अंडरलाइंग की कीमत, स्पॉट में बढ़ती जाती है तो ऑप्शन बेचने वाले का नुकसान भी उसी के साथ लगातार तेजी से बढ़ता जाता है। लेकिन अगर शेयर बाजार या स्टॉक एक्सचेंज के नजरिए से देखें तो क्या वह ऑप्शन बेचने वाले का रिस्क घटाने के लिए कोई रास्ता और निकाल सकता है? अगर ऑप्शन बेचने वाले का रिस्क या नुकसान इतना ज्यादा हो जाता है कि वह नुकसान उठाने के बजाय डिफॉल्ट करने का फैसला कर ले तो?

यह निश्चित है कि कोई भी स्टॉक एक्सचेंज ऐसी स्थिति नहीं आने देगा जहां पर ऑप्शन बेचने वाला एक बहुत बड़ा डिफॉल्ट कर बैठे। इसीलिए यह जरूरी होता है कि ऑप्शन बेचने वाला एक निश्चित रकम एक्सचेंज के पास मार्जिन मनी के तौर पर जमा करे। ऑप्शन बेचने वाले की मार्जिन उसी तरीके की होती है जैसे कि फ्यूचर्स कॉन्ट्रैक्ट में होती है। 

ज़ेरोधा मार्जिन कैलकुलेटर के नीचे दिए स्नैपशॉट में  देखते हैं कि बजाज ऑटो फ्यूचर्स और बजाज ऑटो की 2050 के स्ट्राइक प्राइस वाले कॉल ऑप्शन एग्रीमेंट की मार्जिन क्या है, दोनों की एक्सपायरी 30 अप्रैल 2015 है।


और 2050 के कॉल ऑप्शन को बेचने के लिए मार्जिन है-

जैसा कि आप देख सकते हैं कि ऑप्शन राइटिंग यानी ऑप्शन बेचने और फ्यूचर एग्रीमेंट के लिए मार्जिन की जरूरत करीब-करीब बराबर है। लेकिन इसमें एक छोटा सा अंतर भी है। इस अंतर पर हम आगे विस्तार से चर्चा करेंगे। अभी सिर्फ ये याद रखिए कि मार्जिन की जरूरत करीब-करीब बराबर है और रकम भी लगभग एक बराबर है।

4.5 – सभी बातें एक साथ/अब सभी बातों को एक साथ देखते हैं

मुझे उम्मीद है कि पिछले 4 अध्यायों के बाद अब आप ऑप्शन बेचने और ऑप्शन खरीदने को लेकर काफी बातें जान और समझ चुके हैं। वैसे दूसरे विषयों के मुकाबले ऑप्शन को समझना थोड़ा ज्यादा मुश्किल होता है। इसीलिए हमें जब भी मौका मिले हमें यह कोशिश करनी चाहिए कि जो कुछ अभी तक सीखा है उसे दोहरा लिया जाए। इसीलिए एक बार फिर से उन खास बातों पर नजर डालते हैं जो ऑप्शन को बेचने और खरीदने से जुड़ी हुई  हैं।

ऑप्शन खरीदने से जुड़ी बातें

  • ऑप्शन तभी खरीदना चाहिए जब आपको उम्मीद हो कि अंडरलाइंग की कीमत बढ़ने वाली है। अगर एक्सपायरी के दिन स्पॉट की कीमत आपके स्ट्राइक प्राइस से ऊपर पहुंच जाती हैं तभी आपको इस एग्रीमेंट या समझौते में फायदा होगा।
  • ऑप्शन खरीदने को लांग आन कॉल ऑप्शन – ‘Long on a Call Option’ या केवल लांग कॉल –Long Call कहते हैं।
  • ऑप्शन खरीदने के लिए आपको ऑप्शन राइटर को एक प्रीमियम अदा करना पड़ता है।
  • कॉल ऑप्शन के खरीदार का रिस्क बहुत ही सीमित होता है (उसने जितना प्रीमियम दिया है) लेकिन उसका मुनाफा असीमित हो सकता है। 
  • ब्रेक इवन प्वाइंट वो कीमत है जहां पर कॉल ऑप्शन के खरीदार को न फायदा हो रहा होता है और ना ही नुकसान हो रहा होता है।
  • P&L = Max[0,(स्पॉट कीमत स्ट्राइक कीमत)] दिया गया प्रीमियम /P&L = Max [0, (Spot Price – Strike Price)] – Premium Paid
  • ब्रेक इवन प्वाइंट = स्ट्राइक कीमत + दिया गया प्रीमियम/Breakeven point = Strike Price + Premium Paid

ऑप्शन बेचने से जुड़ी अहम बातें

  • ऑप्शन बेचना (जिसे ऑप्शन राइटिंग भी कहते हैं) तभी करना चाहिए जब आपको उम्मीद हो कि एक्सपायरी के दिन तक अंडर लाइंग की कीमत स्ट्राइक प्राइस के नीचे ही रहेगी। 
  • आपशन बेचने को शॉर्टिंग आ कॉल ऑप्शन –‘Shorting a call option’ कहते हैं या कभी कभी सिर्फ शार्ट कॉल –Short Call भी कहते हैं। 
  • जब आप ऑप्शन बेचते हैं तो आपको प्रीमियम के तौर पर एक रकम मिलती है।
  • ऑप्शन बेचने वाले का मुनाफा सीमित होता है- उतना ही जितना कि उसे प्रीमियम मिला है लेकिन उसका नुकसान असीमित हो सकता है। 
  • ब्रेकडाउन प्वाइंट वो कीमत है जहां पर ऑप्शन बेचने वाले का ना तो फायदा हो रहा होता है और ना ही नुकसान हो रहा होता है, ब्रेकडाउन कीमत तक पहुंचते-पहुंचते वह अपना पूरा प्रीमियम गंवा चुका होता है। 
  • क्योंकि ऑप्शन के शार्ट पोजीशन में असीमित रिस्क होता है इसलिए ऑप्शन बेचने वाले को एक्सचेंज को मार्जिन मनी देनी पड़ती है।
  • ऑप्शन की मार्जिन मनी भी फ्यूचर्स कॉन्ट्रैक्ट के मार्जिन मनी की तरह ही होती है।

कुछ और महत्वपूर्ण बातें 

  • जब आप किसी स्टॉक पर तेजी में होते हैं या बुलिश होते हैं तो आप उस स्टॉक को स्पॉट बाजार में खरीदते हैं या फ्यूचर्स बाजार में खरीदते हैं या फिर उस स्टॉक का कॉल ऑप्शन खरीदते हैं।
  • जब आप किसी स्टॉक को लेकर मंदी में होते हैं तो आप उसको स्पॉट में बेच सकते हैं उसे फ्यूचर्स में बेच सकते हैं या फिर ऑप्शन बाजार में उसको शॉर्ट कर सकते हैं। 
  • किसी कॉल ऑप्शन की इंट्रिंसिक वैल्यू पर इस बात का कोई असर नहीं पड़ता कि आप कॉल ऑप्शन को बेच रहे हैं या खरीद रहे हैं।
  • लेकिन अगर कॉल ऑप्शन की जगह यह पुट ऑप्शन है तो फिर इंट्रिंसिक वैल्यू में बदलाव होता है।
  • कॉल ऑप्शन का नेट P&L इस बात के साथ बदलता है कि आप बेचने वाले हैं या खरीदने वाले। 
  • पिछले चार अध्यायो में हमने सिर्फ और सिर्फ एक्सपायरी के दिन तक P&L को देखा है ताकि आपको इन सिद्धांतों को ठीक से समझ सकें।  
  • ऑप्शन का ज्यादातर कारोबार मार्जिन में बदलाव पर आधारित होता है उदाहरण के तौर पर अगर मैंने बजाज ऑटो का 2050 के स्ट्राइक प्राइस वाला ऑप्शन ₹6.35 के प्रीमियम पर खरीदा और दोपहर होते-होते उसका प्रीमियम बढ़कर ₹9 हो सकते हो गया है तो मैं इसको बेच कर अपना मुनाफा बुक कर सकता हूं।
  •  किसी भी ऑप्शन का प्रीमियम लगातार हर मिनट बदलता रहता है। इसके बदलने के पीछे कई तरीके की चीजें काम कर रही होती हैं जिनको हम आगे के अध्याय में समझेंगे।
  • कॉल ऑप्शन का छोटा रूप CE होता है तो बजाज ऑटो के 2050 कॉल ऑप्शन को बजाज ऑटो 2050CE लिखा जाता है। यहां CE का अर्थ है यूरोपियन कॉल ऑप्शन।

4.6- यूरोपियन vs  अमेरिकन ऑप्शन – European Vs American Option

भारत में जब ऑप्शन कारोबार की शुरुआत हुई थी तो यहां 2 तरीके के ऑप्शन थे अमेरिकन ऑप्शन और यूरोपियन ऑप्शन। सभी तरह के इंडेक्स ऑप्शन जैसे निफ़्टी ऑप्शन या बैंक निफ़्टी ऑप्शन यूरोपियन ऑप्शन पर आधारित होते थे जबकि अलग-अलग स्टॉक्स के ऑप्शन अमेरिकन ऑप्शन होते थे। इन दोनों का अंतर ऑप्शन के एक्सरसाइज करने के तरीके पर आधारित होता था।

यूरोपियन ऑप्शन यूरोपियन ऑप्शन में खरीदार को अपना ऑप्शन एक्सरसाइज करने के लिए नियमित रूप से ऑप्शन की एक्सपायरी तक इंतजार करना पड़ता था। सेटलमेंट इस आधार पर होता था कि एक्सपायरी के दिन अंडरलाइंग की स्पॉट में क्या कीमत है। इसका मतलब यह है कि अगर बजाज ऑटो का कॉल ऑप्शन 2050 के स्ट्राइक प्राइस पर खरीदा गया है तो खरीदार को मुनाफा तभी होगा जब बजाज ऑटो का शेयर एक्सपायरी के दिन स्पॉट में स्ट्राइक प्राइस से ऊपर जाएगा। अगर ऐसा नहीं होता तो वह सारा पैसा जो उसने प्रीमियम के तौर पर अदा किया है वह डूब जाएगा।

अमेरिकन ऑप्शन  अमेरिकन ऑप्शन में ऑप्शन खरीदने वाले के पास अपने ऑप्शन को कभी भी एक्सरसाइज करने का अधिकार होता है। इस ऑप्शन में सेटलमेंट उस समय की कीमत के आधार पर होता है जब खरीदने वाले ने ऑप्शन को एक्सरसाइज किया, ना कि उस कीमत पर जो एक्सपायरी के दिन होती है। इसका मतलब है कि अगर किसी ने बजाज ऑटो का 2050 के स्ट्राइक प्राइस वाला ऑप्शन खरीदा है जबकि आज उसकी कीमत 2030 है तो जिस किसी भी दिन बजाज ऑटो की कीमत 2050 के ऊपर पहुंच जाती है तो ऑप्शन खरीदने वाला अपने ऑप्शन को एक्सरसाइज कर सकता है और ऑप्शन बेचने वाले को अपना दायित्व पूरा करना होगा इस पर इस बात का कोई असर नहीं होता कि एक्सपायरी में अभी कितने दिन बाकी हैं।

जो लोग ऑप्शन के बारे में जानते हैं वह यह सवाल उठा सकते हैं कि जब हमें यह अधिकार है कि ऑप्शन को खरीदने के 30 मिनट बाद भी अगर हम चाहे तो अपना ऑप्शन एक्सरसाइज कर सकते हैं तो फिर इस बात से क्या अंतर पड़ता है कि वह ऑप्शन यूरोपियन है या अमेरिकन? 

यह सवाल सही है। इस सवाल का जवाब जानने के लिए हम एक बार फिर से अजय और वेणु वाले उदाहरण पर नजर डालते हैं। इस उदाहरण में अगर अजय के पास ये अधिकार होता कि वह 6 महीने में कभी भी आकर इस समझौते पर से जुड़े अपने ऑप्शन के अधिकार का इस्तेमाल कर सकता है और ऐसी स्थिति में अगर कोई अफवाह फैलती है कि हाईवे प्रोजेक्ट शुरू होने वाला है तो हो सकता है कि जमीन की कीमत काफी ऊपर चली जाती, ऐसे में अजय यह फैसला कर सकता है कि वह अपने ऑप्शन के अधिकार को अभी एक्सरसाइज करेगा और वेणु के पास इसके सिवा कोई रास्ता नहीं होता कि वह इस जमीन को अजय को बेच दे (भले ही उसे इस बात का अंदाज हो कि यह कीमत सिर्फ इसलिए ऊपर गई है क्योंकि यह अफवाह काफी तेजी से फैली है)। क्योंकि इस तरह के ऑप्शन में वेणु ज्यादा रिस्क ले रहा होगा कि अजय कभी भी ऑप्शन एक्सरसाइज कर सकता है, इसलिए उसे अब ज्यादा प्रीमियम भी चाहिए होगा। 

इसी वजह से अमेरिकन ऑप्शन हमेशा यूरोपियन ऑप्शन के मुकाबले ज्यादा महंगे होते हैं 

आपको अभी यह भी जानना चाहिए कि इसी वजह से करीब 3 साल पहले यानी 2012 में NSE ने अमेरिकन ऑप्शन को पूरी तरीके से छोड़ दिया है। अब भारतीय बाजार में सभी ऑप्शन यूरोपियन ऑप्शन पर ही आधारित हैं। इसका मतलब है कि अब सभी ऑप्शन एक्सपायरी के दिन की कीमत पर ही एक्सरसाइज किए जाते हैं। 

अगले अध्याय में अब हम पुट ऑप्शन के बारे में बात करेंगे।

इस अध्याय की मुख्य बातें 

  1. आप कॉल ऑप्शन तभी बेचते हैं जब आप मंदी में होते हैं यानी आपका नजरिया बेयरिश होता है। 
  2. कॉल ऑप्शन बेचने वाले और को खरीदने वाले का P&L एक दूसरे के एकदम विपरीत होता है। 
  3. जब आप कॉल ऑप्शन बेचते हैं तो आपको एक प्रीमियम मिलता है। 
  4. कॉल ऑप्शन बेचने वाले को एक्सचेंज में एक मार्जिन जमा करना होता है।
  5. ऑप्शन बेचने वाले का मुनाफा सीमित होता है उतना ही जितना कि उसे प्रीमियम मिल रहा है लेकिन उसको होने वाला नुकसान असीमित हो सकता है।
  6. P&L = प्रीमियम –  Max[0,(स्पॉट कीमत स्ट्राइक कीमत)]
  7. ब्रेक डॉउन प्वाइंट = स्ट्राइक कीमत + प्राप्त प्रीमियम
  8. भारत में सभी ऑप्शन यूरोपियन होते हैं। 

162 comments

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  1. जगदीश राज चोपड़ा says:

    एक्शन बेचने को शॉर्टिंग ऑन कॉल ऑप्शन –‘Shorting a call option’ कहते हैं या कभी कभी सिर्फ शार्ट कॉल –‘Short Call’ भी कहते हैं।
    (Option) आपशन बेचने को—–एक्शन बेचने को ……..मुझे लगता है जहां सुधार होना चाहिए।

    जगदीश राज चोपड़

  2. Karan boldra says:

    Tq zerodha

  3. Rahul says:

    1-Kya time ke sath same strike value ke option ka premium bhi change ho jata h.
    And second que
    2- option ke case mai loss sirf premium ammount ka hi hota h. Kya loss buy or sell ke case mai change hota h in CE.

    • Kulsum Khan says:

      Hi Rahul,
      1. अंडरलाइंग सिक्योरिटी के प्राइस में बदलाव के साथ, विकल्प प्रीमियम में परिवर्तन होता है। यदि स्ट्राइक प्राइस समान है तो प्रीमियम भी स्थिर रहेगा।
      2. ऑप्शन खरीदार के लिए नुकसान सीमित हैं उसके प्रीमियम प्राइस तक, और ऑप्शन विक्रेता के लिए नुकसान असीमित हैं। चाहे CE या PE हो।

  4. Ashwin says:

    Aapke @2072 wale mein calculation mistake hain.

    = 6.35 – Max [0, (2072 – 2050)]
    = 6.35 – 22
    = -15.56 (Galat Answer)

    Answer Hoga 15.65

  5. Ashwin says:

    P&L = Premium – Max [0, (Spot Price – Strike Price)]

    Kya aap please batayenge ki upar wale equation mein Max aur 0 ka kya importance hain.

    • Kulsum Khan says:

      वह एक सार्वभौमिक रूप से P & L की गणना के लिए उपयोग किया जाने वाला एक मानक फार्मूला है।

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